चार वर्षों से जारी यमन युद्ध के दौरान सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान के समर्थन संचार माध्यमों में एनीमेशन से तैयार एक वीडियो प्रसारित किया जिसमें दिखाया गया था कि बिन सलमान ईरान के खिलाफ युद्ध का नेतृत्व कर रहे हैं और उसके दौरान वह तेहरान पर क़ब्ज़ा और ईरान के नेता को गिरफ्तार करने में सफल हो जाते हैं लेकिन अब साबित हो गया है कि वह वीडियो क्लिप, बिन सलमान का सपना थी और अब वह ज़मीनी सच्चाई के सामने घुटने टेकने पर विवश हो गये हैं।
बिन सलमान की सत्ता से पहले, सऊदी अरब राजनीतिक व सैनिक क्षेत्र में, कई पक्षों विशेषकर ईरान से कड़ी शत्रुता के बावजूद, संतुलित भाषा और व्यवहार अपनाता रहा है लेकिन सऊदी अरब के शासक सलमान बिन अब्दुलअज़ीज़ की बीमारी के बाद जब सत्ता की कुंजी उनके बेटे और क्राउन प्रिंस बिन सलमान के हाथ में आयी तो सऊदी अरब की चाल ही बदल गयी और वह अपनी सैनिक शक्ति से सब को धमकाने लगा और ईरान जैसे कुछ देशों के खिलाफ जहां बंदर बिन सुलमान जैसे शाही परिवार के सदस्य छुप कर कार्यवाहियां करते थे वहीं बिन सलमान ने यह सब कुछ खुल्लम खुल्ला करना आंरभ कर दिया।
सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस में आत्मविश्वास का दो मुख्य कारण था। पहला तो यह कि उन्हें यह लगता कि कि उनके पास जो अत्याधिक हथियार हैं उससे उन्हें ही सफलता मिलेगी क्योंकि सऊदी अरब हथियार खरीदने के मामले में दूसरा का पांचवा सब से बड़ा देश है। दूसरे यह कि उन्हें यह विश्वास था कि डोनाल्ट ट्रम्प के नेतृत्व में अमरीका ईरान के खिलाफ युद्ध अवश्य छेड़ेगा। पश्चिमी विशेषज्ञों की सेवाएं लेने के बावजूद बिन सलमान हालात को समझने में भारी गलती कर बैठे और यमन पर हमला कर दिया। उनका विचार था कि वह ईरान के प्रभाव को कम कर देंगे मगर हालात इस तरह से बने कि सऊदी अरब अब ऐसे दलदल में फंस गया कि जिसका उदाहरण अतीत में नहीं मिलता। अब सऊदी अरब को इस कड़वी सच्चाई का सामना करना पड़ रहा है कि फार्स की खाड़ी में ईरान एक बड़ी क्षेत्रीय ताक़त बन चुका है और ईरान को विश्वास में लिये बिना क्षेत्र में कोई भी बड़ा फैसला करना संभव नहीं है।
अब तो यमन युद्ध में हौसी मज़बूत हो रहे हैं बल्कि वह सऊदी अरब के तेल उद्योग को निशाना बनाने की क्षमता भी रखते हैं। इसके साथ ही देर से ही सही लेकिन सऊदी अरब की समझ में यह आ गया है कि वाशिंग्टन, ईरान के खिलाफ आसानी से युद्ध छेड़ने वाला नहीं है क्योंकि उसे क्षेत्र और स्वंय अमरीका के लिए इस प्रकार के युद्ध के भयानक परिणाम का अंदाज़ा है। यह बात, ईरान द्वारा अमरीका के अत्याधुनिक ड्रोन विमान, " ग्लोबल हॉक " को मार गिराए जाने के बाद सऊदी अरब की समझ में ज़्यादा आ गयी इसके बाद ईरान ने ब्रिटेन के तेल वाहक जहाज़ पर भी क़ब्ज़ा कर लिया और ईरान के सामने वह ब्रिटेन मजबूर नज़र आया जिसके साम्राज्य में कभी सूरज नहीं डूबता था।
सऊदी अरब यह सब कुछ देख रहा था उसके साथ ही यमन में उसकी हर योजना विफल हो रही है, पूरी दुनिया उसे युद्ध अपराधी के रूप में देख रही है, विश्व की विभिन्न सरकारें, उसे हथियार बेचने से इन्कार करने लगी हैं और सब से महत्वपूर्ण यह कि हौसियों के सामने वह विफल हो चुका है फिर हौसियों ने सऊदी अरब के दम्माम नगर को निशाना बना कर रही सही कसर भी पूरी कर दी। हौसियों के हमलों को रोकने में पेट्रियॉट डिफेन्स सिस्टम की विफलता ने भी सऊदी अरब को काफी निराश किया।
इन हालात में सऊदी अरब के पास ईरान के सामने झुकने के अलावा कोई रास्ता नहीं है और यही वजह है कि अब सऊदी संचार माध्यमों में ईरान के खिलाफ ज़हर नहीं उगला जाता इसी लिए इस परिवर्तन को, ईरान के साथ वार्ता की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है।
हौसियों की बढ़ती ताक़त, फार्स की खाड़ी में अमरीका व ब्रिटेन के खिलाफ ईरान का दबदबा और यह विश्वास कि वाशिंग्टन या इस्राईल में से कोई भी ईरान के खिलाफ युद्ध का साहस नहीं करेगा, वह कारण हैं जिनके आधार पर सऊदी अरब ने ईरान के सामने चुपचाप झुकना आरंभ कर दिया है। सऊदी अरब ने यमन पर हमले कर कर दिये हैं, ईरान को बुरा भला कहना कम कर दिया है। यूएई की तो बहुत पहले ही यह बात समझ में आ गयी थी इसी लिए उसने यमन से वापसी आरंभ कर दी है और इसके साथ ही वह सऊदी अरब के लिए वापसी की राह भी खोल रहा है।